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माँ आर्टिकल (ma article)

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http://mystories028.blogspot.in/2013/06/blog-post_35.html

माँ वो शब्द है जो एक नारी को पूर्णता प्रदान करता है। कहते हैं विवाह के पश्चात एक स्त्री पूर्ण तब तक नहीं होती जब तक की वो माँ नहीं बन जाती, किन्तु क्या किसी बालक को जन्म दे कर ही वो माँ बन्ने का गौरव हासिल कर सकती है। यदि की किसी कारणवश वो किसी संतान को जन्म ना दे पाए तो इसका अभिप्राय क्या ये लगा लेना उचित होगा की वो स्त्री अपूर्ण है। ये भले सच एक है की एक नारी संतान को जनने के पश्चात बालकों के और भी ज्यादा करीब आ जाती है, वो उनके दुःख-सुख और अनेक प्रकार की समस्याओं को आसानी से समझ सकती है, उसमे ममता का सागर उमड़ता रहता है जो ना सिर्फ केवल अपनी ही संतानों के लिए अपितु वो सभी बालकों जो उसके बच्चों के मित्र है या जो भी उसके अपने बच्चों की उम्र के या अन्य जो भी बालक हैं उन सबके लिए रहता है, वो उन सभी बालकों से प्रेम रखती है स्नेह रखती है इसके साथ ही वो बालकों की बातों एवं उनकी समस्याओं को पहले की अपेक्षा संतान जनने एवं माँ बनने के बाद वो अधिक समझने लगती है।

किन्तु नारी में ये गुण केवल संतान के जन्म देने के बाद ही उत्पन्न हो ये सत्य नहीं है, शाश्त्रों में भी नारी को ममता की मूरत कहा गया है किन्तु इसका अभिप्राय ये नहीं की उसमे ममता का संचार तभी हो जब वो माँ बने और एक बालक को जन्म दे, ममता का अर्थ है निःस्वार्थ सच्चा और पवित्र प्रेम जिसमे केवल देना है और बदले में कुछ भी पाने की उम्मीद नहीं है, जिसमे पवित्रता अपनापन अपार स्नेह, सुरक्षा है वो ममता है, ये गुण नारी में केवल एक संतान को जन्म देने के बाद नहीं आते ये गुण तो उसमे यधय्पि जन्मजात होते है। और माँ स्त्री न केवल अपने जन्म दिए बच्चों की बनती है यदि वो चाहे तो कई बेघर और लाचार अनाथ बच्चों की माँ बन कर उनका सहारा बन कर उन्हें अपना मात्रत्व दे कर उनकी जीवन में माँ की कमी को पूर्ण कर सकती है, कहते हैं एक बच्चे को ज़िन्दगी में सबसे अधिक आवशकता माँ की होती है क्योंकि एक बालक माँ के गर्भ से ले कर दुनिया में आने तक और जब तक उसमे पूर्ण रूप से समझ, आत्मविश्वाश और आत्मनिर्भरता ना आये माँ के साथ की जरुरत महसूस करता है, हालाकि माँ की जरुरत उम्र भर रहती है मनुष्य को किन्तु जब मनुष्य ऊपर बतायी गयी इन सब चीजे को पा लेता है तब उसे माँ इन सब वाश्तुओं के आगे छोटी लगने लगती है, ऐसे लोग माँ के महत्व से अनजान होते है।

माँ की आवश्यकता जितनी मनुष्य को होती है उतनी ही आवश्यकता पशु-पक्षियों एवं जीवों को होती है। हमने यहाँ पे इस विषय में एक कहानी भी लिखी थी “पौराणिक कथा” ( http://mystories028.blogspot.in/2013/01/pauranik-katha.html) जो पशु-पक्षियों का मानव के प्रति एवं मानव और माँ के प्रेम को उजागर करती है की किस प्रकार एक साधू-साध्वी अपने वन के पशु-पक्षियों को अपने बालक मान कर उनका पालन पोषण करते थे और वो जीव भी उन्हें अपने सगे माता-पिता मान कर उसने असीम प्रेम रखते थे।

दोस्तों माँ दुनिया में एक ऐसा विषय है जिसके बारे में जितना कहा जाए उतना कम है, दुनिया में कही भी आप रहे और किसी भी जीव को आप देखे हर जीव यदि वो जीवित है तो उसे माँ आवश्यकता हमेशा रहती है।

दोस्तों मेरी ही अपनी एक आप बीती है जिसे आपसे शेयर करने का मेरा दिल कर रहा है, वैसे तो मेरी अभी तक शादी नहीं हुई और मुझे बच्चों से वैसे तो दूर रहना ही अच्छा लगता है हाँ ये बात और है की बच्चे मुझे बहुत पसंद करते हैं, वेल ये बात और है पर अब हम आपको अपनी एक आप बीती बताते हैं की किसी को पा कर हमने पहली बार अपने अन्दर मातृत्व के भाव को अनुभव किया था, ये बात है २७ अप्रेल सन २ ० ० ० की, २ ८ अप्रेल को मेरा जन्म दिन था और मेरी विश थी मम्मी पापा से की मुझे डौगी दिया जाए जन्मदिन के उपहार में, वेल दोस्तों गॉड ने मेरी ये विश सुन ली, मेरे जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले हमारे घर २ बहुत ही प्यारे डौगी पापा ले कर आ गए और उन्हें मेरा जन्मदिन का उपहार बता कर मुझे दे दिया, पर उन्हें देख कर मैं और घर के अन्य सदस्य थोडा हेरान थे क्योंकि ये डौगी तो सिर्फ ७ दिन के थे और उनका बिना माँ के पल पान बड़ा ही मुश्किल था, वेल हमे लगा की शायद इन्हें इनकी माँ के पास अब छोड़ के आना पड़ेगा और पापा ने हमे सिर्फ मन रखने के लिए इन्हें दिया है, पर हमारी मम्मी ने हिम्मत दी और कहा क्यों नहीं ये पल सकते, जब तुम्हे हम पाल सकते हैं तो इन्हें क्यों नहीं, बस फिर क्या था उनके मार्ग दर्शन से(चुकी हमारी मम्मी का आँखों का ऑपरेशन हुआ था इस्ल्लिये वो खुद उनकी देख भाल करने में असमर्थ थी ) हमने इनकी परवरिश शुरू की, दोस्तों अपने इन पेट्स की देखभाल करते हुए मुझे पहली बार अहसास हुआ माँ का, मैंने इन पेट्स में अपने बच्चों को अनुभव किया और अहसास हुआ मुझे की एक स्त्री केवल किसी बालक को जन्म दे कर या फिर किसी मनुष्य के बच्चे को गोद ले कर ही माँ नहीं बन सकती अपितु उसमे तो ये गुण जन्मजात होते हैं और माँ तो एक स्त्री ऐसे ही किसी मासूम पशु-पक्षी को अपने पास रख और उसका ख्याल रख कर भी बन सकती है, जैसा वो इन्हें अपना बालक समझ कर इनका ख्याल रखेगी वैसे ही ये भी अपनी सगी माँ समझ कर उसका ख्याल रखेगे।

दोस्तों मेरे पेट्स ने ना सिर्फ मेरा बल्कि हमारे पूरे परिवार का ख्याल रखा और हमेशा हमारे दुःख-सुख में साथ रहे, २ ० सितम्बर २ ० १ १ की रात हमारे एक बच्चे की मृत्यु हो गयी किन्तु अभी भी वो जीवित है हमारे दिल में और दुसरे बच्चे की भी मृत्यु पहले की मिर्त्यु के २ साल २ दिन बाद लेकिन वो आज भी है हमारे पास एक याद बन कर और एक कर, ये ही अहसास मुझे हर पल उनकी माँ होने का अहसास कराता है इसके साथ ही समस्त पशु-पक्षियों में भी अपने बच्चो की ही झलक दिखा कर उनकी भी माँ होने का अहसास ।

माँ वो अहसास है जो किसी को जन्म देने से नहीं अपितु खुद ही किसी को अपने करीब आने से खुद ही दिल से निकल कर उसपे लुटने को तैयार हो जाता है, दुनिया में सबसे हसीं और प्यारा अहसास है माँ का जिसे पाने के लिए देवता भी ना जाने कितने रूप लेते है।

http://mystories028.blogspot.in/2013/06/blog-post_35.html

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